सड़क किनारे एक विशाल वृक्ष के नीचे थककर बैठे और हांफते हुए, वह मुझसे नजरें मिलाकर, मानो कुछ कहना चाहती हो। अफ़सोस! प्रकृति उसे जुबान देना भूल गई, पर खैर... बातें जब भावनाओं से हों, तो अक्सर हम सभी गूंगे हो जाते हैं। मौन संवाद के उस क्रम में, उसकी आँखों ने पूछा— "इतना ज़ुल्म क्यों?" मैं निरुत्तर था... वह फिर बोली— "कर्म का फल तो कर्ता को मिलता है, पर तुमने तो सृष्टि का यह नियम ही बदल डाला! खुद को बचाने को तुम कृत्रिम हवाओं (एसी-कूलर) में छिप गए, पर हमारी तड़प का क्या?" यह सुन मैं स्तब्ध रह गया। एक गहरी पीड़ा के साथ मैंने कहा— "प्रिय, उदास न हो, यह तपन सिर्फ तुम्हें ही नहीं, मेरे जैसे करोड़ों साधनहीन मनुष्यों को भी जिंदा झुलसा रही है।" तभी लू का एक खौफनाक झोंका आया, और उस निर्दोष के प्राण अपने साथ उड़ा ले गया। वह पल ऐसा था... मानो नियति मेरा और उस जीव के मिलन का इंतजार कर रही हो, कि जाओ... कोई अपनी अंतिम वेदना लिए, सिर्फ तुम्हारे कंधों का इंतजार कर रहा है।