# 💫 मंदिर की वो पहली मुलाकात --- शहर अभी नींद से जाग ही रहा था, जब मंदिर की घंटियाँ गूँज उठीं। सुबह की नरम धूप मंदिर की सीढ़ियों पर बिछी थी, और उन्हीं सीढ़ियों पर अदिति के पाँव धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहे थे। हाथ में फूल थे, आँखों में एक अजीब सी खालीपन — वो खालीपन जो तब आता है जब कोई रिश्ता टूटता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मरता है। उसका breakup हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। लोग कहते हैं वक्त सब ठीक कर देता है — पर अदिति जानती थी कि वक्त सिर्फ ज़ख्म पर पर्दा डालता है, मिटाता नहीं। उसने ईश्वर के सामने फूल रखे और आँखें बंद कर लीं। --- उसी वक्त मंदिर की दहलीज़ पर एक कदम रुका। आदित्य। वो पहली बार यहाँ आया था — न किसी मन्नत के लिए, न किसी रिवाज़ के लिए। बस यूँ ही, जैसे किसी ने अंदर से धकेल दिया हो। उसने जूते उतारे, अंदर कदम रखा, और तभी उसकी नज़र पड़ी। अदिति। आँखें बंद, हाथ जुड़े, होंठों पर एक अधूरी-सी प्रार्थना। आदित्य एक पल के लिए वहीं जम गया। उसे खुद नहीं पता था कि यह क्या था — पर दिल के किसी कोने में जैसे कोई तार छिड़ गया हो, जो पहले कभी बजा ही नहीं था। *पहली नज़र का प्यार होता है — यह उसने किताबों में पढ़ा था। आज उसे यकीन हो गया।* --- उस दिन के बाद आदित्य रोज़ मंदिर आने लगा। पर कभी आगे नहीं बढ़ा। कभी बात करने की कोशिश नहीं की। बस दूर से देखता — जैसे कोई तस्वीर को छूने से डरता है कि कहीं रंग न उड़ जाएँ। अदिति को शायद उसकी मौजूदगी का अंदाज़ा था। पर उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसके लिए तो मर्दों की मोहब्बत एक झूठ थी — एक खूबसूरत झूठ, जो वक्त के साथ बदसूरत हो जाता है। --- फिर एक दिन आदित्य ने कुछ किया जो उसने खुद भी नहीं सोचा था। बाज़ार की एक पुरानी दुकान में उसने वो झुमके देखे — ठीक वैसे जैसे अदिति मंदिर में पहनती थी। छोटे, सुनहरे, किनारे पर एक नन्ही-सी फूल की नक्काशी। उसने खरीद लिए। *क्यों?* — उसे खुद नहीं पता था। शायद इसलिए कि उसे लगा, इन्हें देखकर वो एक पल के लिए मुस्कुरा दे। अगले दिन मंदिर में उसने वो झुमके एक छोटी सी पुड़िया में लपेटकर अदिति की तरफ बढ़ाए। कुछ नहीं कहा। बस हाथ आगे किया। --- अदिति ने देखा। पहले उस लड़के को, फिर उस पुड़िया को। और फिर — कुछ टूट गया उसके अंदर। वो पुराना गुस्सा, वो पुरानी तकलीफ, वो धोखे की याद — सब एक साथ उबल पड़ी। उसने वो पुड़िया ले ली। और ज़मीन पर दे मारी। *"मुझे नहीं चाहिए किसी की दया।"* — आवाज़ में आग थी, पर आँखें भीगी थीं। लोग रुक गए। मंदिर में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। --- आदित्य झुका। धीरे से उसने वो झुमके उठाए, धूल झाड़ी, और जेब में रख लिए। फिर उसने अदिति की तरफ देखा — न गुस्से से, न शिकायत से। बस शांति से। *"मैंने ये तुम्हें जीतने के लिए नहीं लाए थे,"* उसने कहा, आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। *"जो इंसान टूटा हो, उसे जीता नहीं जाता — बस उसके पास खड़े रहते हैं।"* --- अदिति कुछ नहीं बोली। पर उस दिन घर लौटते वक्त उसके कदम थोड़े भारी थे। एक सवाल था जो पीछे लगा था — *क्या सच में कोई ऐसा भी होता है?* --- वो झुमके महीनों तक आदित्य की जेब में रहे। और अदिति के दिल में — एक दरवाज़ा, जो बंद था, उसकी कुंडी अब थोड़ी ढीली हो गई थी। --- > *कभी-कभी प्यार शोर नहीं करता।* > *वो चुपचाप आता है — और चुपचाप ही दिल के सबसे बंद कमरे की चाबी बन जाता है।* 🌸