वह रात… जब मक्का की ख़ामोश गलियाँ सो रही थीं। काबा के चारों तरफ अंधेरा था। आसमान पर सितारे थे। और ज़मीन पर एक ऐसे इंसान मौजूद थे जिन्हें उनकी क़ौम ने झुठलाया, सताया, और तन्हा करने की कोशिश की। फिर अचानक… अल्लाह के हुक्म से आसमानों के दरवाज़े खुलने वाले थे। यह कोई आम सफ़र नहीं था। यह सफ़र था मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक। फिर ज़मीन से आसमानों तक। एक ऐसा सफ़र जिसमें रसूल-ए-अकरम ﷺ ने अल्लाह की अज़ीम निशानियाँ देखीं, अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम से मुलाक़ात की, और उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए सबसे क़ीमती तोहफ़ा लेकर वापस आए। वह तोहफ़ा क्या था? वह तोहफ़ा था… नमाज़। रसूलुल्लाह ﷺ की ज़िंदगी का एक बेहद अज़ीम वाक़िआ “इस्रा व मेराज” है। इस्रा का मतलब है रात के वक़्त सफ़र करना, जबकि मेराज का मतलब है बुलंद होना, ऊपर चढ़ना। क़ुरआन-ए-मजीद, सूरह अल-इस्रा की पहली आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि वह ज़ात पाक है जो अपने बंदे को रात के वक़्त मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक ले गई, ताकि उसे अपनी निशानियाँ दिखाए। यह आयत सिर्फ़ एक सफ़र का बयान नहीं। यह ऐलान है कि अल्लाह के लिए कोई चीज़ नामुमकिन नहीं। मक्का में रसूलुल्लाह ﷺ दावत-ए-इस्लाम दे रहे थे। क़ुरैश मुख़ालफ़त कर रहे थे। मुसलमान कमज़ोर थे, मगर ईमान मज़बूत था। ऐसे वक़्त में अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को अपनी अज़ीम निशानियों का मुशाहिदा करवाया। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायतों में इस सफ़र की तफ़सीलात मिलती हैं, जिनमें हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत मालिक बिन सअसा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी रिवायतें ख़ास तौर पर मशहूर हैं। रात का वक़्त था। रसूलुल्लाह ﷺ के पास हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक, आप ﷺ का सीना खोला गया, उसे ज़मज़म के पानी से धोया गया, फिर ईमान और हिकमत से भर दिया गया। यह मंज़र सिर्फ़ जिस्मानी पाकीज़गी का नहीं था। यह एक अज़ीम सफ़र की तैयारी थी। फिर हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम एक ख़ास सवारी लेकर आए, जिसे बुराक़ कहा जाता है। सहीह मुस्लिम की रिवायत में बुराक़ को एक सफ़ेद जानवर बताया गया है, जो गधे से बड़ा और खच्चर से छोटा था, और उसकी रफ़्तार बहुत तेज़ थी। रसूलुल्लाह ﷺ उस बुराक़ पर सवार हुए। और फिर वह सफ़र शुरू हुआ जिसे इंसान की आँखों ने पहले कभी नहीं देखा था। मक्का पीछे रह गया। सहरा पीछे रह गया। ज़मीन की हदें पीछे रह गईं। और रसूलुल्लाह ﷺ मस्जिद-ए-अक्सा पहुँच गए। क़ुरआन-ए-मजीद सूरह अल-इस्रा, आयत 1 में इसी सफ़र का ज़िक्र फ़रमाता है: मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक, जिसके गिर्द-ओ-नवाह को अल्लाह ने बरकत दी। मस्जिद-ए-अक्सा… अंबिया की सरज़मीन। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सरज़मीन। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की सरज़मीन। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की सरज़मीन। और वहाँ रसूलुल्लाह ﷺ ने तमाम अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम की इमामत फ़रमाई। सहीह मुस्लिम की रिवायत में आता है कि आप ﷺ ने अंबिया को नमाज़ पढ़ाई। यह लम्हा तारीख़ का एक अज़ीम ऐलान था। तमाम अंबिया का पैग़ाम एक था। अल्लाह एक है। उसी की इबादत करो। और रसूलुल्लाह ﷺ आख़िरी नबी हैं, जिनके ज़रिए यह पैग़ाम क़यामत तक के लिए मुकम्मल किया गया। नमाज़ के बाद आसमानी सफ़र का आग़ाज़ हुआ। हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह ﷺ को लेकर पहले आसमान पर पहुँचे। आसमान के दरवाज़े पर सवाल हुआ: कौन है? हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: जिब्रील। फिर सवाल हुआ: तुम्हारे साथ कौन है? फ़रमाया: मुहम्मद ﷺ। पूछा गया: क्या उन्हें बुलाया गया है? जवाब आया: जी हाँ। दरवाज़ा खुल गया। पहले आसमान पर रसूलुल्लाह ﷺ की मुलाक़ात हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से हुई। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने रसूलुल्लाह ﷺ को ख़ुश आमदीद कहा। वह अपने दाईं तरफ नेक रूहों को देखते तो ख़ुश होते, और बाईं तरफ बदकार रूहों को देखते तो ग़मगीन होते। यह मंज़र इंसान को याद दिलाता है कि हर अमल महफ़ूज़ हो रहा है। हर नेकी। हर बुराई। हर ख़ामोश फ़ैसला। फिर सफ़र दूसरे आसमान की तरफ बढ़ा। वहाँ हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रत यहया अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। दोनों अंबिया ने रसूलुल्लाह ﷺ को ख़ुश आमदीद कहा और दुआ दी। तीसरे आसमान पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। सहीह मुस्लिम की रिवायत में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के हुस्न का ज़िक्र मिलता है। वह नबी जिन्होंने कुएँ की तन्हाई देखी, ग़ुलामी देखी, क़ैद देखी, मगर अल्लाह पर भरोसा नहीं छोड़ा। चौथे आसमान पर हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। क़ुरआन-ए-मजीद सूरह मरयम में हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम के बारे में फ़रमाता है कि अल्लाह ने उन्हें बुलंद मक़ाम अता फ़रमाया। पाँचवें आसमान पर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। छठे आसमान पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मौजूद थे। वही मूसा अलैहिस्सलाम जिन्होंने फ़िरऔन के सामने हक़ की दावत दी। वही मूसा अलैहिस्सलाम जिन्होंने समंदर को अल्लाह के हुक्म से रास्ता बनते देखा। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने रसूलुल्लाह ﷺ को ख़ुश आमदीद कहा। फिर सातवें आसमान पर रसूलुल्लाह ﷺ की मुलाक़ात हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बैतुल मामूर के पास तशरीफ़ फ़रमा थे। बैतुल मामूर वह मुक़द्दस घर है जिसमें रोज़ाना सत्तर हज़ार फ़रिश्ते इबादत के लिए दाख़िल होते हैं, और फिर उनकी बारी दोबारा नहीं आती। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम… काबा के तामीर करने वाले। और रसूलुल्लाह ﷺ… काबा के पैग़ाम को पूरी दुनिया तक पहुँचाने वाले। यह मुलाक़ात एक रूहानी रिश्ता थी। बाप-ए-अंबिया और ख़ातमुन नबीय्यीन ﷺ का रिश्ता। फिर रसूलुल्लाह ﷺ को सिदरतुल मुन्तहा तक ले जाया गया। क़ुरआन-ए-मजीद सूरह अन-नज्म, आयात 13 से 18 में बयान करता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने अज़ीम निशानियाँ देखीं। वहाँ निगाह न बहकी और न हद से आगे बढ़ी। यह वह मक़ाम था जहाँ इंसानी अल्फ़ाज़ कमज़ोर हो जाते हैं। जहाँ अक़्ल रुक जाती है। जहाँ सिर्फ़ अल्लाह की अज़मत बाक़ी रहती है। और इसी अज़ीम मक़ाम पर उम्मत-ए-मुहम्मद ﷺ के लिए नमाज़ फ़र्ज़ की गई। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक, इब्तिदा में पचास नमाज़ें फ़र्ज़ की गईं। रसूलुल्लाह ﷺ वापस आए तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा: आपकी उम्मत पर क्या फ़र्ज़ किया गया है? रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: पचास नमाज़ें। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि आपकी उम्मत इसकी ताक़त नहीं रख सकेगी, अपने रब के पास वापस जाइए और कमी की दरख़्वास्त कीजिए। रसूलुल्लाह ﷺ बार बार अल्लाह तआला के हुज़ूर गए। नमाज़ों की तादाद कम होती गई। पचास से चालीस। चालीस से तीस। फिर बीस। फिर दस। और आख़िर में पाँच नमाज़ें रह गईं। लेकिन अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अज्र पचास नमाज़ों का ही होगा। यह अल्लाह की रहमत है। पाँच वक़्त की नमाज़। फ़ज्र। ज़ुहर। अस्र। मग़रिब। इशा। सिर्फ़ चंद लम्हे। मगर अज्र पचास नमाज़ों का। रसूलुल्लाह ﷺ मक्का वापस तशरीफ़ लाए। सुबह हुई तो आप ﷺ ने क़ुरैश को इस सफ़र के बारे में बताया। उन्होंने मज़ाक़ उड़ाया। उन्होंने कहा कि मक्का से बैतुल मुक़द्दस तक का सफ़र तो कई दिनों में होता है, तुम एक रात में कैसे गए और वापस आ गए? यह ईमान का इम्तिहान था। क़ुरआन-ए-मजीद सूरह अल-इस्रा, आयत 60 में इस रुयत को लोगों के लिए आज़माइश क़रार दिया गया। क़ुरैश ने रसूलुल्लाह ﷺ से मस्जिद-ए-अक्सा की निशानियाँ पूछीं। सहीह बुख़ारी की रिवायत के मुताबिक, अल्लाह तआला ने मस्जिद-ए-अक्सा को रसूलुल्लाह ﷺ के सामने नुमायाँ फ़रमा दिया, और आप ﷺ ने उसकी निशानियाँ बयान कर दीं। फिर क़ुरैश हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गए। उन्होंने कहा: तुम्हारे साथी कहते हैं कि वह एक रात में बैतुल मुक़द्दस गए और वापस आ गए। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया: अगर मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया है तो सच फ़रमाया है। यही वह यक़ीन था जिसने उन्हें “सिद्दीक़” का मक़ाम दिया। दुनिया के लिए यह वाक़िआ हैरत था। मोमिन के लिए यह ईमान था। मेराज सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ नहीं। यह हर मुसलमान के लिए पैग़ाम है। रसूलुल्लाह ﷺ आसमानों तक गए, मगर उम्मत के लिए नमाज़ लेकर वापस आए। हम दुनिया की दौड़ में मसरूफ़ हैं। कारोबार, मोबाइल, शोहरत, परेशानी, और ख़्वाहिशात। लेकिन मेराज हमें याद दिलाती है कि मुसलमान की असल ताक़त उसका अल्लाह से ताल्लुक़ है। नमाज़ सिर्फ़ फ़र्ज़ नहीं। नमाज़ अल्लाह से मुलाक़ात है। नमाज़ दिल की सफ़ाई है। नमाज़ ज़िंदगी के अंधेरों में रोशनी है। जब रसूलुल्लाह ﷺ को सबसे अज़ीम तोहफ़ा दिया गया, तो वह नमाज़ थी। आज सवाल यह है: क्या हम इस तोहफ़े की क़दर करते हैं? क्या हम फ़ज्र की अज़ान पर उठते हैं? क्या हम सज्दे में अपने रब से बात करते हैं? मेराज का पैग़ाम वाज़ेह है। ज़मीन पर रहते हुए भी आसमान से ताल्लुक़ पैदा करो। दुनिया में चलते हुए भी आख़िरत को याद रखो। और जब ज़िंदगी मुश्किल हो जाए, तो नमाज़ की तरफ लौट आओ। क्योंकि वही नमाज़ है… जो बंदे को अपने रब के क़रीब कर देती है।