बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक साधारण युवक रहता था। उसके पास न धन था, न बड़ा घर, न ही कोई विशेष पहचान। लोग उसे अक्सर कमज़ोर और असफल समझते थे क्योंकि वह किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था और हर दिन मंदिर जाकर चुपचाप भगवान के सामने बैठ जाता था। गाँव वाले कहते, “इससे कुछ नहीं होगा, सिर्फ़ भगवान-भगवान करता रहता है।” लेकिन माधव के दिल में जो भक्ति थी, वह दिखावे की नहीं, सच्ची थी। वह भगवान को पाने के लिए नहीं, बल्कि भगवान से प्रेम करने के लिए उनकी पूजा करता था। माधव का जीवन बहुत कठिन था। कई बार घर में खाने के लिए अनाज तक नहीं होता था। लेकिन फिर भी वह कभी भगवान से शिकायत नहीं करता। जब भी वह मंदिर जाता, बस इतना कहता, “हे प्रभु, जैसा भी रखा है, अच्छा रखा है।” उसकी भक्ति में कोई सौदा नहीं था, कोई माँग नहीं थी। वह मानता था कि अगर भगवान ने उसे कष्ट दिया है, तो उसमें भी कोई कारण होगा। यही विश्वास उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी। एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। खेत सूख गए, कुएँ खाली हो गए और लोग भगवान से नाराज़ हो गए। कई लोगों ने मंदिर जाना बंद कर दिया। किसी ने कहा, “अगर भगवान होते तो ऐसा क्यों होता?” लेकिन माधव हर दिन पहले से भी ज़्यादा श्रद्धा से मंदिर जाने लगा। जब सब हार गए, तब भी वह भगवान के चरणों में बैठकर रोता नहीं था, बल्कि मुस्कुरा कर दीप जलाता था। उसकी भक्ति अब और गहरी हो गई थी। एक दिन गाँव में एक साधु आए। उन्होंने कहा, “मैं ऐसे भक्त की तलाश में हूँ जिसकी भक्ति स्वार्थ से मुक्त हो।” सब लोग आगे बढ़े और अपने-अपने दुख गिनाने लगे। कोई धन माँग रहा था, कोई संतान, कोई सुख। लेकिन माधव चुपचाप पीछे खड़ा था। साधु की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने पूछा, “तुम कुछ नहीं माँगते?” माधव ने सिर झुका कर कहा, “माँगने के लिए तो मैं बहुत छोटा हूँ, प्रभु ने जो दिया है वही बहुत है।” साधु मुस्कुरा दिए। उन्होंने कहा, “यही सच्ची भक्ति है।” फिर उन्होंने गाँव के लोगों को समझाया कि भगवान को पाने के लिए बड़े शब्दों की नहीं, सच्चे दिल की ज़रूरत होती है। उस दिन के बाद साधु चले गए, लेकिन माधव का जीवन बदल गया। गाँव में धीरे-धीरे बारिश होने लगी। लोग हैरान थे, लेकिन माधव जानता था कि यह किसी चमत्कार का नहीं, बल्कि विश्वास का फल है। कुछ समय बाद गाँव के लोगों ने माधव का सम्मान करना शुरू किया। वही लोग जो कभी उसे तुच्छ समझते थे, अब उससे आशीर्वाद माँगते थे। लेकिन माधव के मन में ज़रा भी अहंकार नहीं आया। वह कहता, “मैं कुछ नहीं हूँ, सब कुछ भगवान हैं।” उसकी भक्ति ने उसे बड़ा नहीं बनाया, बल्कि और भी विनम्र बना दिया। एक रात माधव को स्वप्न आया। भगवान ने कहा, “माधव, तुमने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा, इसलिए आज मैं तुमसे पूछता हूँ—क्या चाहिए?” माधव की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा, “हे प्रभु, अगर देना ही है तो बस इतना देना कि मेरी भक्ति कभी कम न हो।” भगवान मुस्कुराए और बोले, “जिसे भक्ति मिल जाए, उसे सब कुछ मिल जाता है।” सुबह जब माधव की नींद खुली, तो उसका जीवन वही था—वही घर, वही गाँव, वही सादगी। लेकिन अब उसका हृदय शांति से भरा था। उसे समझ आ गया था कि भक्ति का अर्थ भगवान से कुछ पाना नहीं, बल्कि खुद को भगवान के हवाले कर देना है। जिसने यह सीख ली, वही सच्चा भक्त है। इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति शोर नहीं करती, दिखावा नहीं करती और किसी स्वार्थ से बंधी नहीं होती। जब इंसान अपने अहंकार, अपनी शिकायतें और अपनी माँगें छोड़ देता है, तभी भक्ति जन्म लेती है। और जब भक्ति सच्ची हो जाती है, तो भगवान खुद भक्त की रक्षा करते हैं।
