बचपन से एक डायलॉग... लगभग हर लड़के ने सुना है: 'लड़के रोते नहीं।' (हल्का रुकें) पर किसी ने यह नहीं बताया... कि एक उम्र के बाद, रोने की जगह भी नहीं बचती। (गहरा सांस लें) क्योंकि हर बार चोट घुटने पर नहीं लगती... कभी-कभी चोट उस भरोसे पर लगती है, जो किसी पर खुद से ज्यादा किया था। जब पहली बार दिल टूटा था, आँखें भर आई थी... पर होंठों से सिर्फ एक झूठ निकला: 'मैं ठीक हूँ।' (छोटा गैप) उस दिन किसी ने गले नहीं लगाया... किसी ने यह नहीं पूछा कि ज़ख्म कितना गहरा है। बस कंधे पर हाथ रखकर धीमे से कह दिया गया: 'भूल जा... मर्द इतने कमजोर नहीं होते।' (गहरी आवाज़ में) उस दिन आँसू तो रुक गए... पर दिल के अंदर एक दरार पड़ गई, जो आज तक भरी नहीं। फिर धीरे-धीरे दर्द छुपाना आदत बन गया... चुप रहना समझदारी बन गया... और मुस्कुराना जिम्मेदारी बन गया। (तेज़ी से) दिल चिल्लाया, चेहरा हँसा... अंदर तूफान, बाहर मज़ाक। हमें दर्द बताना कभी सिखाया ही नहीं गया... हमें बस उसे सहन करना सिखाया गया। (अंतिम पंक्ति, धीरे) फिर एक उम्र के बाद... लड़का रोता नहीं है, वो पत्थर बन जाता है।"