🎬 हुक (Hook) रात का अंधेरा… एक शांत बस्ती… एक माँ की चिल्लाहट हवा को चीर रही है। उसके सामने उसका बेटा बेहोश पड़ा है। लोग निराश खड़े हैं। उम्मीद खत्म हो चुकी है। अचानक… एक नबी चुपचाप आगे बढ़ते हैं। वो हाथ उठाते हैं… दुआ करते हैं… और फिर… एक ऐसा दृश्य जो इतिहास बदल देता है। क्या सच में एक इंसान ने मरे हुए लोगों को ज़िंदा किया? यह चमत्कार कैसे हुआ? और इसके पीछे अल्लाह का क्या संदेश था? 🎬 परिचय (Introduction) हज़रत ईसा (अलैहि सलाम)… बनी इस्राएल के महान पैग़म्बर। एक ऐसी क़ौम की तरफ भेजे गए… जो चमत्कार देखने की आदत में थी… लेकिन दिलों से कठोर हो चुकी थी। क़ुरआन शरीफ़, सूरह आल-इमरान आयत 49 में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) अल्लाह के हुक्म से अंधों को शिफा देते… कुढ़ियों को ठीक करते… और मृतकों को ज़िंदा करते थे। ये चमत्कार शक्ति का प्रदर्शन नहीं थे… बल्कि अल्लाह की क़ुदरत का सबूत थे। यह वह समय था जब बनी इस्राएल के उलेमा दुनियावी ताक़त में खो गए थे। लोग धर्म के ज़ाहिर को मानते थे… लेकिन रूह को भूल चुके थे। ऐसे समय में अल्लाह ने एक नबी भेजा… जिनकी पैदائش ही चमत्कार थी। सूरह मरियम में अल्लाह ने हज़रत मरियम (अलैहि सलाम) की पवित्रता और हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) की चमत्कारी पैदائش का ज़िक्र किया। बचपन में हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) ने लोगों से बातें की… जैसा कि सूरह मरियम आयत 29–33 में बताया गया है। ये सभी चमत्कार एक संदेश थे… कि अल्लाह जिसे चाहे इज़्ज़त दे… और जिस तरह चाहे अपने धर्म की मदद करे। 🎬 मुख्य कहानी (Main Story) 🔹 दृश्य 1 — क़ौम की स्थिति बनी इस्राएल का शहर… पूजा स्थल… धार्मिक उलेमाओं के घेरे। ज़ाहिर में धर्म था… लेकिन दिलों में अहंकार। लोग चमत्कार मांगते थे… लेकिन ईमान नहीं लाते थे। तारीख-ए-तबरि और सिएरत इब्न हिशाम में लिखा है कि उस समय लोग आध्यात्मिकता से दूर हो चुके थे। उन्हें ऐसे संकेतों की जरूरत थी… जो उनके घमंड को तोड़ दें। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) ने नरम लहजे में बुलाया। उन्होंने लोगों को अल्लाह की ओर आमंत्रित किया… तौबा की दावत दी… और दुनियावी लालच से बचने की सलाह दी। 🔹 दृश्य 2 — शिफ़ा के चमत्कार एक अंधा व्यक्ति… वर्षों से अंधकार में था। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) ने दुआ की… और अल्लाह के हुक्म से उसकी दृष्टि लौट आई। क़ुरआन सूरह अल-माइदा आयत 110 में अल्लाह फरमाते हैं कि हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) अल्लाह के इज़्न से अंधों और कुढ़ियों को शिफ़ा देते थे। यह चमत्कार देखकर लोग हैरान हुए… कुछ ईमान लाए… और कुछ ने ईर्ष्या शुरू कर दी। एक कुढ़ी… जिसे लोग छूते भी नहीं थे… वह हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) के पास आया। नबी ने दुआ की… और अल्लाह ने उसे शिफ़ा दी। लेकिन क़ौम के सरदार बोले: “यह जादू है।” 🔹 दृश्य 3 — सबसे बड़ा इम्तिहान एक दिन… एक शव शहर से गुजर रहा था। माँ रो रही थी… लोग दुखी थे। बनी इस्राएल के कुछ लोगों ने हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) को परखने के लिए कहा: “अगर तुम सच में अल्लाह के नबी हो… तो इसे ज़िंदा कर दो।” यह क्षण खतरनाक था। यह चमत्कार केवल अल्लाह की इच्छा से ही हो सकता था। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) ने सिर झुका लिया… और अल्लाह से दुआ की। क़ुरआन सूरह आल-इमरान में स्पष्ट है कि सभी चमत्कार “बिअज़्निल्लाह” यानी अल्लाह के हुक्म से होते थे। नबी शव के पास गए और बोले: “ऐ अल्लाह… अगर तू चाहे… तो यह ज़िंदा हो जाए।” ख़ामोशी छा गई। फिर… शव ने हलचल की। आँखें खुलीं। साँसें वापस आईं। लोग हैरानी से चिल्लाए। 🔹 दृश्य 4 — प्रतिक्रिया कुछ लोग सजेदा में गिर गए। उन्होंने कहा: “हम ईमान लाए।” लेकिन कुछ उलेमा गुस्से में भर गए। उन्होंने कहा: “यह खतरनाक है। लोग हमारी बात नहीं मानेंगे।” सूरह अस-सफ़्फ़ में अल्लाह ने बताया कि बनी इस्राएल के कुछ लोगों ने हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) की مخالफत की… जबकि कुछ ईमान लाए। यही वह पल था जब ईर्ष्या ने साजिश की शक्ल ले ली। 🔹 दृश्य 5 — और भी चमत्कार तारीख-ए-तबरि में लिखा है कि हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) ने अल्लाह के हुक्म से कई मृतकों को ज़िंदा किया। उनमें एक युवक भी था… जिसे ज़िंदा होने के बाद ईमान मिला। हर चमत्कार एक संदेश था: ज़िंदगी और मौत अल्लाह के हाथ में है। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) बार-बार कहते: “मैं कुछ नहीं करता… सब अल्लाह का हुक्म है।” 🔹 दृश्य 6 — साजिशें और परीक्षा क़ौम के सरदार भयभीत हो गए। उन्होंने लोगों को हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) के खिलाफ भड़काना शुरू किया। कहा गया: “यह धर्म को बदल रहा है।” सूरह अन-निसा आयत 157 में अल्लाह ने इन साजिशों का ज़िक्र किया… जहां लोगों ने हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। लेकिन अल्लाह ने अपने नबी की रक्षा की। 🎬 ऊँचाई — सबसे शक्तिशाली पल रात… अकेलापन… दुआ। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) सजेदा में थे। उन्होंने अल्लाह से कहा: “ऐ मेरे रब… लोग निशानियाँ देखते हैं… लेकिन दिल नहीं बदलते।” इस समय… अल्लाह ने उन्हें तसल्ली दी। सूरह अल-माइदा आयत 110 में अल्लाह ने इन चमत्कारों का ज़िक्र करते हुए फरमाया कि यह सब अल्लाह की मदद से हुआ। यह एहसास… कि असली मकसद चमत्कार नहीं… बल्कि मार्गदर्शन है… यही हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) की सबसे बड़ी सफलता थी। 🎬 अंत और सबक हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) के चमत्कार हमें यह सिखाते हैं कि ताक़त अल्लाह के हाथ में है। मृतकों को ज़िंदा करना… बीमारियों को ठीक करना… यह सब अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं। लेकिन सबसे बड़ा चमत्कार… दिल का ज़िंदा होना है। क़ुरआन हमें बार-बार याद दिलाता है कि निशानियाँ सिर्फ़ उनके लिए हैं… जो सच की तलाश में हैं। आज… हम भी निशानियों से घिरे हुए हैं। ज़िंदगी… स्वास्थ्य… ईमान… यह सब अल्लाह की रहमत है। हज़रत ईसा (अलैहि सलाम) की कहानी हमें सिखाती है कि: घमंड ईमान को मार देता है। ईर्ष्या सच को छुपा देती है। और चमत्कार भी बेकार है… अगर दिल बंद हो। तो सवाल यह है… क्या हम चमत्कार देखने वाले हैं… या चमत्कार से सीखने वाले? यही इस कहानी का असली संदेश है। ज़िंदगी और मौत अल्लाह के हाथ में है… और मार्गदर्शन… सिर्फ़ उसके हुक्म से मिलता है।
