गाँव सोनापुर के बाहर एक विशाल बरगद का पेड़ था। इतना पुराना कि उसकी जड़ें ज़मीन से निकलकर साँपों की तरह फैली हुई थीं। दिन में वह बस एक पेड़ लगता था… लेकिन रात में— कोई उसके पास नहीं जाता था। गाँव वाले कहते थे— “जो सूरज ढलने के बाद काले बरगद के नीचे गया, वो वापस तो आया… लेकिन पहले जैसा नहीं।”