“मेरे प्यारे दोस्तों… आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ… जो सिर्फ एक कहानी नहीं… बल्कि यकीन, सब्र और अल्लाह पर भरोसे की सबसे बड़ी मिसाल है…” “सोचिए… एक वीरान जगह… जहाँ ना पानी है… ना कोई इंसान… ना कोई सहारा…” “वो जगह है… मक्का…” “और उसी वीरानी में… हजरत इब्राहीम अल्लाह के हुक्म से अपनी बीवी हजरत हाजरा और छोटे से बच्चे हजरत इस्माइल को छोड़कर चले जाते हैं…” “सोचिए… एक माँ का दिल… जब वो पूछती है — ‘क्या ये अल्लाह का हुक्म है?’ और जवाब मिलता है — ‘हाँ…’” “तो वो क्या कहती है?” “वो कहती है — ‘फिर अल्लाह हमें कभी ज़ाया नहीं करेगा…’” “दोस्तों… यही है यकीन…” “दिन गुजरते हैं… पानी खत्म हो जाता है… खाना खत्म हो जाता है…” “और एक माँ… अपने मासूम बच्चे को प्यास से तड़पते हुए देख रही है…” “छोटे से हजरत इस्माइल की रोने की आवाज… उस वीरान वादी में गूंज रही है…” “क्या आप ये मंजर सह सकते हैं…?” “हजरत हाजरा नहीं सह पाईं…” “वो दौड़ीं… सफा की तरफ…” “ऊपर चढ़कर देखा… शायद कहीं पानी मिल जाए…” “लेकिन… कुछ नहीं…” “फिर वो दौड़ीं… मरवा की तरफ…” “एक बार नहीं… दो बार नहीं…” “पूरा सात बार…!” “दोस्तों… ये सिर्फ दौड़ नहीं थी… ये उम्मीद थी… ये दुआ थी… ये यकीन था…” “और जब वो सातवीं बार मरवा पर पहुंचीं… और पीछे मुड़कर देखा…” “तो क्या हुआ…?” “अल्लाह की रहमत उतर चुकी थी…” “छोटे से हजरत इस्माइल के पास… जमीन से पानी फूट रहा था…” “रिवायत बताती है… कि जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के हुक्म से आए… और जमीन से चश्मा निकाल दिया…” “हजरत हाजरा दौड़ीं… और कहती हैं — ‘ज़म ज़म… ज़म ज़म…’ यानी… ‘रुको… रुको…’” “और दोस्तों… वहीं से शुरू हुआ… चश्मा-ए-जमजम…” “एक ऐसी जगह… जहाँ कुछ भी नहीं था…” “आज वही जगह… पूरी दुनिया का सबसे मुकद्दस मुकाम है…” “और वो पानी… आज भी बह रहा है…” “ना खत्म हुआ… ना कम हुआ…” “दोस्तों… ये सिर्फ एक मोजिजा नहीं…” “ये एक पैगाम है…” “अगर तुम्हारी जिंदगी में भी मुश्किलें हैं… अगर हर रास्ता बंद नजर आता है…” “तो याद रखो…” “अल्लाह के खजाने कभी खत्म नहीं होते…” “बस… तुम्हारा यकीन… हजरत हाजरा जैसा होना चाहिए…” “फिर देखना… जहाँ से कोई उम्मीद नहीं होती…” “वहीं से… तुम्हारी जिंदगी में भी ‘जमजम’ फूटेगा…”