कुछ सालों पहले, यह शहर सुकून से था जी रहा, अब बना कब्रिस्तान, देखो खून के आँसू पी रहा। भूख से तड़प रहे यहां के बड़े और बच्चे, लाइक, स्क्रॉल कर रहे, खुद को समझ रहे हम अच्छे। बहादुर सिपाही हैं वो भी देखो सच्चे, नए मुसलमान हैं, इस दौर के, ईमान के हैं हम कच्चे। हर दिन देखो वहां कोई न कोई मर रहा, सब बैठे देख रहे हैं, कोई कुछ क्यों नहीं कर रहा। इन्हें रिश्ते हैं संभालने पहले, फिर ईमान आए बाद में, हिंदुस्तान के मुसलमान और ईरान खड़ा साथ में। चाइना ने भी दिया साथ, देखो इन हालात में, खौफ इतना बढ़ा, यह सो नहीं पा रहे रात में। कोई मर रहा है यहां, किसी की बन रही देखो ईद, सब देख के हंस रहे, पर वो हो रहे हैं शहीद। जब सबने बेघर किया, तब फ़िलिस्तीन ने दिया सहारा, यह आस्तीन के साँप डस के बोले, "अब फ़िलिस्तीन है हमारा।" एक बेटी बाप की बाहों में सुकून की मौत सो रही, एक माँ अपने बेटे का कफ़न पकड़ कर रो रही। बच्चों को मार कर बड़े बनते हैं यह साले, हाल हुआ इतना बुरा, अब सब ऊपर वाले के हवाले। मेरी खुदा से है यही दुआ, बस फ़िलिस्तीन को बचा ले।
