कभी-कभी ना… बहुत जोर से रोने का मन करता है। लेकिन आवाज़ गले से बाहर ही नहीं आती। अजीब है ना? बचपन में गिर जाते थे तो जोर से रो लेते थे। अब जिंदगी रोज़ गिराती है… पर हम चुप रहते हैं। (pause) आज बस… थोड़ा सा सच बोलना है। क्योंकि शायद ये वीडियो देख रहा कोई लड़का… मेरी तरह ही चुप बैठा होगा। लोग कहते हैं, “लड़के मजबूत होते हैं।” शायद होते होंगे… पर ये मजबूत बनने का सफर कोई नहीं देखता। घर में बड़े बेटे हो तो जिम्मेदारियाँ अपने आप नाम के साथ जुड़ जाती हैं। “तू ही संभाल ले।” “तू समझदार है।” “तू मर्द है।” मर्द… ये शब्द बहुत भारी है। पापा की तबीयत खराब हो तो डर अपने अंदर रख लेते हैं। मम्मी परेशान हों तो खुद की चिंता भूल जाते हैं। छोटे भाई-बहन की फीस हो… तो अपनी जरूरतें काट देते हैं। कभी सोचा है… कितनी बार हम अपनी इच्छा मार देते हैं? सिर्फ इसलिए क्योंकि घर को हमसे उम्मीद है। (pause) और सच बताऊँ… हमें उस उम्मीद से शिकायत नहीं है। शिकायत बस इतनी है… कि कभी किसी ने पूछा नहीं — “तू ठीक है ना?” सबको लगता है लड़के रोते नहीं। पर सच ये है… हम रोते हैं। बस किसी के सामने नहीं। बाथरूम में शॉवर के नीचे। रात को तकिये में चेहरा छुपाकर। या फिर छत पर जाकर… आसमान को देखकर। आँसू गिरते हैं… पर आवाज़ नहीं निकलती। क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया — “रोएगा तो लोग कमजोर समझेंगे।” तो हमने रोना बंद नहीं किया… बस छुपाना सीख लिया।