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@Aadil Gouri
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जब रमज़ान के बाबरकत महीने में इफ़्तारी के वक्त एक भूख से निढाल मुसाफ़िर हज़रत मुहम्मद ﷺ के पास पेश हुआ तो एक ग़रीब सहाबी ने उस मुसाफ़िर की ऐसी मदद की कि क़ुरआन में उस सहाबी और उनके घर वालों की तारीफ़ हमेशा के लिए महफ़ूज़ कर दी। ये उस वक्त की बात है जब मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़-ए-असर के बाद एक मुसाफ़िर हाज़िर हुआ। उसका चेहरा पीला, लिबास फटा और हालत बेहाल थी। वह नबी करीम ﷺ के पास आया और गिड़गिड़ाकर अर्ज़ करने लगा, “या रसूल अल्लाह, मैं भूख और प्यास से निढाल हूँ, मेरी मदद फरमाइए।” आप ﷺ का दिल भर आया। आपने अपने घर पैग़ाम भेजा तो हज़रत आयशा ने जवाब दिया कि घर में सिर्फ पानी है। आप ﷺ ने सहाबा की तरफ देखकर फरमाया, “आज रात इस शख्स को कौन अपना मेहमान बनाएगा, तो अल्लाह उस पर रहम फरमाएगा।” उस वक्त हज़रत तल्हा अंसारी رضي الله عنه खड़े हुए और उस मेहमान को अपने घर ले गए। घर पहुँचकर अहलिया से पूछा, “कुछ खाने को है?” उन्होंने जवाब दिया, “खुदा की कसम, सिर्फ बच्चों के लायक थोड़ा-सा खाना है।” अबू तल्हा ने फरमाया, “बच्चों को कहानी सुनाओ और सुला दो, और जब दस्तरख़्वान पर बैठो तो तुम किसी बहाने चिराग बुझा देना। हम अंधेरे में अपना मुँह ऐसे हिलाएँगे जैसे हम भी खा रहे हैं, ताकि मेहमान पेट भर खा सके और उसे शर्मिंदगी न हो।” उम्मे सुलैम ने बच्चों को कहानी सुनाकर सुला दिया। जैसे खाना शुरू हुआ तो उम्मे सुलैम ने चिराग बुझा दिया। अंधेरे में अबू तल्हा और उम्मे सुलैम अपना हाथ ऐसे चलाते रहे जैसे खा रहे हों, मगर हकीकत में उन्होंने एक लुक्मा भी नहीं खाया। मेहमान बेफिक्र होकर पेट भर कर खाता रहा। रात में मियाँ-बीवी और बच्चे भूखे सो गए, मगर दिल मुतमइन था कि रसूल अल्लाह ﷺ के मेहमान की खिदमत कर दी। फ़ज्र की नमाज़ के बाद जब अबू तल्हा मस्जिद में पहुँचे तो नबी करीम ﷺ ने मुस्कुराकर फरमाया, “कल रात तुम दोनों ने अपने मेहमान के साथ जो किया, उसे देखकर अल्लाह तआला अर्श पर खुश हुआ।” इसी मौके पर क़ुरआन की सूरह अल-हश्र की आयत नाज़िल हुई: “और वो अपनी ज़ात को दूसरों पर तरजीह देते हैं, चाहे वो खुद फाक़े से हों।” इस सच्चे वाक़िया का मकसद सिर्फ यही है कि इस रमज़ान में अपनी इफ़्तारी किसी एक भूखे ग़रीब मुसाफ़िर को ज़रूर शामिल करें, चाहे आपके पास खर्च कम ही क्यों न हो, क्योंकि बाँटने से बरकत बढ़ती है।

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