एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। लोग कहते थे कि पंडित जी बहुत ज्ञानी हैं, लेकिन उनका अहंकार आसमान छूता था।एक दिन गाँव में एक साधु आया। उसने कहा – "पंडित जी, आप बहुत विद्वान हैं, लेकिन क्या आप सच का आईना देखना चाहेंगे?पंडित जी हँसकर बोले – "मुझे कौन सिखाएगा? मैं तो सब जानता हूँ।साधु ने एक छोटा सा आईना निकाला और कहा – "इसमें देखिए।पंडित जी ने जैसे ही देखा, तो उसमें उनका चेहरा नहीं बल्कि उनके झूठ, लालच और घमंड की तस्वीरें दिखाई देने लगीं।पंडित जी चौंक गए – "ये क्या है? मैं तो इतना बड़ा विद्वान हूँ!"साधु मुस्कुराया – "ज्ञान से बड़ा विनम्रता है। अगर अहंकार रहेगा तो ज्ञान भी व्यर्थ है।"गाँव के लोग तालियाँ बजाने लगे और कबीर का दोहा गूँज उठा "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"