गाँव में बूढ़ी दादी रहती थीं, जिनका नाम था दादी लक्ष्मी। उनके बेटा-बहू शहर में रहते थे, तो दादी अकेली थीं। घर बहुत बड़ा था, लेकिन खाली-खाली सा लगता था। उनके दोनों पोते भी शहर पढ़ते थे, तो बच्चों का शोर कभी-कभार ही सुनाई देता था।एक दिन, बारिश के बाद लालटेन लेकर अँगने में निकली तो देखा – एक छोटा, गीला और काँपता हुआ बच्चा झाड़ी के पीछे बैठा था। आँखों में डर था, मानो घर से भागकर आया हो। दादी लक्ष्मी ने उसे गले लगाया और बोलीं, “डरो मत, बेटा, अब तुम घर पर हो।”उस दिन से बच्चा वहीं रहने लगा। दादी ने उसका नाम रखा “राजू”। उसे खाना दिया, सूखी चादर ओढ़ाई, और एक दादी की बाहों में उसने पहली बार सुरक्षा महसूस की। राजू बोलना जल्दी नहीं सीखा, लेकिन आँखों से बात करता था।छोटे बदलावदादी लक्ष्मी के घर धीरे-धीरे जीवन लौट आया। अब सुबह दूध गर्म करने के साथ रोटियाँ भी बनतीं। राजू उनके पैरों के पास बैठकर बातें सुनता और मुस्का देता। दादी अब अकेले नहीं खातीं, बल्कि राजू के साथ पूरा खाना बनातीं।गाँव वालों ने तो बातें करीं – “कहाँ से उठाया है वो बच्चा? शायद चोरी किया है।” लेकिन दादी सिर्फ़ मुस्कुरातीं और कहतीं, “मेरे दिल का दामाद आ गया है।”समय बीता। राजू बोलने लगा, फिर दादी के साथ खेत पर चलने लगा। वह बात-बात पर दादी के काम कर देता। दादी कहतीं, “तू तो बस मेरी आँखों की पलक लग गया है, बेटा।”एक दर्दनाक दिनएक दिन पुलिस आयी। उनके साथ एक जोड़ा था, जिसके बच्चे की गुमशुदगी दर्ज थी। जब उन्होंने राजू को देखा, तो रोने लगे। उन्होंने बताया कि बच्चा उनका बेटा है, जिसे भीड़ में खो गया था।
